Signs of Low Testosterone and Natural Ways to Support Hormonal Health
Expert advice for Hormonal Health; Dr. Sunil Dubey (Dubey Clinic), a renowned sexologist in Patna, Bihar, India
नमस्ते दोस्तों, दुबे क्लिनिक (डॉ. सुनील दुबे) में आपका स्वागत है। जैसा कि आप सभी जानते है, दुबे क्लिनिक और इसके एक्सपर्ट आप सभी की सेवा व उपचार के लिए एक लंबे समय से प्रतिबद्ध और समर्पित रहे है। आज का हमारा यह सत्र उन सभी भाई-बंधुओं के लिए बहुत ही ख़ास है, जो अपने निजी व वैवाहिक जीवन में टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन के कमी या असंतुलन के कारण संघर्ष करते है। वास्तव में, हॉर्मोन का व्यक्ति के जीवन में क्या महत्व है और यह यौन जीवन के साथ-साथ समस्त स्वास्थ्य पर क्या सकारात्मक प्रभाव डालता है, यह जानना अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।
आज इसी विषय पर, विश्व के प्रसिद्ध व भारत के जाने-माने आयुर्वेदाचार्य डॉ सुनील दुबे ने बहुत ही गहनता से विचार-विमर्श किया है। निश्चित ही, यह जानकारी न केवल यौन रोगियों को बल्कि समस्त लोगो को यह समझने में मदद करेगा कि टेस्टोस्टेरोन किसी व्यक्ति के जीवन में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से किस प्रकार प्रभावित करता है। तो, बिना समय बर्बाद किए इस विषय पर आगे बढ़ते हैं।
टेस्टोस्टेरोन क्या है और यह किस प्रकार कार्य करता है?
सबसे पहली बात कि टेस्टोस्टेरोन एक हार्मोन है जो किसी व्यक्ति के जीवन के उसके विकाश और प्रेरणा में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। टेस्टोस्टेरोन एक ऐसा हार्मोन है जिसका निर्माण या उत्पादन मुख्य रूप से पुरुषों में अंडकोष (टेस्टिकल्स) और महिलाओं में अंडाशय (ओवरीज़) में तैयार होता है; या यूँ कहे कि, यह दोनों में (पुरुष व महिला में) एड्रिनल ग्रंथियों द्वारा थोड़ी मात्रा में बनता है। यह व्यक्ति के यौन विकास, प्रजनन, मांसपेशियों और हड्डियों की सेहत, और कुल मिलाकर अच्छी सेहत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।
टेस्टोस्टेरोन का मुख्य कार्य –
पुरुषों में
- प्यूबर्टी (यौवन) के दौरान लिं**ग और अंडकोष का विकास करना।
- पुरुष के आवाज़ में भारीपन का होना।
- व्यक्ति के चेहरे और शरीर पर बालों का उगना।
- मांसपेशियों का आकार और ताकत को बढ़ना।
- हड्डियों की डेंसिटी (घनत्व) बनाए रखने में मदद करना।
- स्पर्म (शुक्राणु) के उत्पादन में मदद करना।
- यौन की इच्छा (लिबिडो) बनाए रखना।
- इरेक्टाइल फंक्शन (लिं**ग में तनाव) में योगदान देना।
वास्तव में देखा जाय तो टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन का संतुलन किसी व्यक्ति के जीवन व उसके स्वास्थ्य में निर्णायक भूमिका निभाता है। साथ ही, यह व्यक्ति के शरीर में उसके रक्त प्रवाह (ब्लड फ्लो), नसों के काम करने की क्षमता और मानसिक कारणों (जैसे कि प्रेरणा, जोश, भावना आदि) की भी भूमिका में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
महिलाओं में
- यौन इच्छा (लिबिडो) को बनाये रखने में मदद करना।
- हड्डियों की मज़बूती व उसके घनत्व को बनाए रखना।
- मांसपेशियों व इसके क्षमता को बनाए रखना।
- कुल मिलाकर ऊर्जा और अच्छी सेहत का बनाए रखना।
उपयुक्त बातों से यह स्पष्ट होता है कि टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य व यौन जीवन में महत्वपूर्ण योगदान (प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से) देता है। सामान्य स्वास्थ्य के मामले में, टेस्टोस्टेरोन की कमी या असंतुलन का व्यक्ति के जीवन में उतना फर्क नहीं डालता जितना उनके यौन स्वास्थ्य में। इसका मूल कारण यह है कि बहुत सारे लोग को हॉर्मोन के असंतुलन के बारे में उतनी जानकारी नहीं होती, जितना उन्हें वास्तव में होना चाहिए। विश्व प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य डॉ. सुनील दुबे, जो भारत के टॉप आयुर्वेदिक सेक्सोलॉजिस्ट डॉक्टर में से एक है, उन्होंने इस समस्या पर विस्तृत रूप से चर्चा किया है। वे अपने नैदानिक अनुभव के आधार पर टेस्टोस्टेरोन की कमी के लक्षण, कारण, संकेत, निदान आदि बातों को विस्तृत रूप से समझाया है। आज के समय में, व्यक्ति में हार्मोनल असंतुलन यौन समस्या का सामान्य कारण बन गया है, जिससे न केवल पुरुष बल्कि महिलाएँ अपने-अपने निजी व वैवाहिक जीवन में जूझ रहे हैं।
टेस्टोस्टेरोन यौन क्रिया में कैसे मदद करता है?
डॉ. दुबे बताते हैं कि टेस्टोस्टेरोन यौन स्वास्थ्य (सेक्सुअल हेल्थ) के लिए एक बहुत ही आवश्यक व प्राथमिक हॉर्मोन है, जो यौन क्रिया के लिए एक जटिल प्रक्रिया का सिर्फ़ एक हिस्सा मात्र है। किसी भी व्यक्ति के यौन गतिविधि उसके शरीर में सही रक्त-संचार (ब्लड फ़्लो), तंत्रिका कार्य (नर्व फ़ंक्शन), मानसिक स्वास्थ्य और समस्त स्वास्थ्य व उसके कल्याण (ओवरऑल हेल्थ) पर ही निर्भर करता है। टेस्टोस्टेरोन किसी व्यक्ति के यौन क्रिया में किस प्रकार योगदान देता है, इसका कुछ उदाहरण निम्नलिखित है।
- सेक्सुअल इच्छा (लिबिडो) को बनाए रखना: टेस्टोस्टेरोन किसी भी व्यक्ति में उसके यौन की इच्छा को नियंत्रण करने में मदद करता है। जब इसका लेवल बहुत कम हो जाता है, तो कुछ लोगों में उनके यौन इच्छा स्वतः कम हो जाती है।
- इरेक्टाइल फ़ंक्शन में योगदान: वास्तव में, टेस्टोस्टेरोन इरेक्शन (लिं**ग में तनाव) का सीधा व प्रत्यक्ष कारण नहीं बनता है। इसका मुख्य कारण यह है कि पुरुष का इरेक्शन सही ब्लड फ़्लो और नर्व सिग्नलिंग पर निर्भर करता है। हालाँकि, टेस्टोस्टेरोन उन बायोलॉजिकल प्रक्रियाओं को बनाए रखने में जरूर मदद करता है जो सामान्य इरेक्टाइल फ़ंक्शन में सहायक होती हैं, और इसके कम स्तर से कुछ पुरुषों में इरेक्शन से जुड़ी समस्याएँ भी हो सकती हैं। हार्मोनल इरेक्टाइल डिसफंक्शन इसका सीधा उदाहरण है।
- स्पर्म प्रोडक्शन में मदद: प्राकृतिक रूप से, पुरुष के अंडकोष में स्पर्म बनने के लिए टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन का होना अनिवार्य है। यहाँ टेस्टोस्टेरोन का सही स्तर पुरुष के सामान्य फर्टिलिटी को विकसित करते है।
- एनर्जी और कॉन्फ़िडेंस बनाए रखना: टेस्टोस्टेरोन का सही लेवल किसी भी व्यक्ति में उसके एनर्जी, मूड और मोटिवेशन को बनाए रखने में मददगार साबित होता है। चूंकि थकान और खराब मूड का असर यौन की इच्छा और परफॉर्मेंस पर पड़ता है, इसलिए अच्छी सेहत बनाए रखने से यौन जीवन पर भी अप्रत्यक्ष रूप से अच्छा असर पड़ सकता है।
- मसल्स और हड्डियों की सेहत बनाए रखने में मदद: टेस्टोस्टेरोन मांसपेशियों और हड्डियों की मज़बूती में मदद करता है, जिससे रोज़मर्रा की गतिविधियों (सेक्सुअल एक्टिविटी सहित) के दौरान शारीरिक फ़िटनेस और स्टैमिना बेहतर हो सकता है।
लो टेस्टोस्टेरोन या टेस्टोस्टेरोन की कमी के क्या लक्षण हैं?
डॉ. सुनील दुबे बताते है कि लो टेस्टोस्टेरोन जिसे टेस्टोस्टेरोन की कमी या मेल हाइपोगोनैडिज्म भी कहा जाता है, से किसी भी व्यक्ति में उसके यौन स्वास्थ्य, एनर्जी लेवल, मूड, और शारीरिक ताकत व स्टैमिना पर सामान्य रूप से असर पड़ता है। मूल रूप से, टेस्टोस्टेरोन की कमी के लक्षण किसी भी व्यक्ति में एकाएक विकसित नहीं होते, बल्कि इसमें समय लगता है जो हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। इसकी कमी के लक्षणों को नीचे दिए गए उदाहरणों से आसानी से समझा जा सकता है:
- यौन गतिविधि की इच्छा में कमी (कम लिबिडो): यह सबसे आम लक्षणों में से एक है, जिसमें व्यक्ति की सामान्य इच्छा की तुलना में यौन गतिविधि में भाग लेने या करने की इच्छा में काफी कमी आ जाती है।
- इरेक्टाइल दिक्कतें (लिं**ग में तनाव की समस्या): कम टेस्टोस्टेरोन वाले कुछ पुरुषों को उनके इरेक्शन पाने या उसे बनाए रखने में परेशानी हो सकती है। हालाँकि, इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की वजह डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारी, तनाव, एंग्जायटी या कुछ दवाओं के साइड इफ़ेक्ट जैसी स्थितियाँ भी हो सकती हैं।
- सुबह के समय कम इरेक्शन: सुबह अपने-आप होने वाले इरेक्शन में कमी का संबंध कम टेस्टोस्टेरोन से हो सकता है, हालांकि दूसरे कारण (शारीरिक, मानसिक, या जीवनशैली) भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं।
- थकान और कम एनर्जी: अगर किसी व्यक्ति को भरपूर नींद लेने के बाद भी ज़्यादातर समय थकान महसूस होती है, तो यह कम टेस्टोस्टेरोन का लक्षण हो सकता है। इस स्थिति में, व्यक्ति का एनर्जी लेवल भी सामान्य से कम हो सकता है।
- मांसपेशियों का द्रव्यमान (मसल मास) और ताकत कम होना: जैसा कि हमें पता होना चाहिए कि टेस्टोस्टेरोन मांसपेशियों के ऊतकों को बनाए रखने में मदद करता है। इसके स्तर में कमी होने से समय के साथ मांसपेशियों की ताकत और मास (मात्रा) कम हो सकती है।
- शरीर में फैट बढ़ना: कुछ पुरुषों के पेट के आस-पास ज़्यादा फ़ैट जमा हो जाता है, या उनके शरीर के आकार में बदलाव साफ़-साफ़ दिखने लगते हैं। यह टेस्टोस्टेरोन में कमी का लक्षण का एक सामान्य उदाहरण भी है।
- मूड में बदलाव: टेस्टोस्टेरोन का लेवल कम होने पर व्यक्ति के मूड में बदलाव आना आम बात है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को चिड़चिड़ापन, लगातार खराब मूड, प्रेरणा की कमी और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।
- दाढ़ी या शरीर के बालों की ग्रोथ कम होना: कुछ मामलों में, अगर व्यक्ति में टेस्टोस्टेरोन की कमी होती है तो उसके चेहरे या शरीर पर बालों की बढ़त या विकास कम हो सकती है।
- कमजोर हड्डियाँ का होना: समय के साथ, टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम होने से हड्डियों का घनत्व (bone density) कम हो सकता है, जिससे व्यक्ति में फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है।
- फर्टिलिटी (प्रजनन क्षमता) से जुड़ी समस्याएँ: पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन स्पर्म बनाने में अहम भूमिका निभाता है। जिन पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन की कमी होती है, उनकी प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) कम हो सकती है।
ये लक्षण सिर्फ़ टेस्टोस्टेरोन की कमी से ही नहीं होते; ये तनाव, ठीक से नींद न आना, डायबिटीज़, डिप्रेशन, दवाओं के साइड इफ़ेक्ट या दूसरी मेडिकल स्थितियों की वजह से भी हो सकते हैं। इसलिए, खुद कोई नतीजा निकालने के बजाय, सबसे पहले डायग्नोस्टिक टेस्ट करवाना ज़रूरी है।
टेस्टोस्टेरोन कमी होने के सामान्य कारण
डॉ. दुबे के अनुसार, किसी भी व्यक्ति में टेस्टोस्टेरोन के स्तर में उतार-चढ़ाव होना एक सामान्य बात है। यह एक जानी-मानी बात है कि 30 साल की उम्र के बाद, टेस्टोस्टेरोन का स्तर हर साल लगभग 1% कम हो जाता है। यह एक प्राकृतिक और जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है। नतीजतन, किसी व्यक्ति के सामान्य या यौन जीवन में बदलाव आना आम बात है। हालाँकि, यह चिंता का विषय तब बन जाता है जब टेस्टोस्टेरोन की कमी किसी व्यक्ति की जीवनशैली, यौन क्षमता, मानसिक स्वास्थ्य या रिश्तों पर असर डालने लगती है। टेस्टोस्टेरोन की कमी के सामान्य कारण निम्नलिखित है:
- उम्र बढ़ना, एक सामान्य प्रक्रिया है।
- मोटापा, जीवनशैली से जुड़ा एक कारक है।
- टाइप 2 डायबिटीज़, एक बीमारी है।
- खराब नींद या स्लीप एपनिया, तनाव का कारण है।
- लगातार तनाव, एक ख़राब मानसिक स्थिति है।
- कुछ दवाएं का दुष्प्रभाव के मेडिकल कारक है।
- अंडकोष से जुड़ी समस्याएं, यौन समस्या है।
- पिट्यूटरी ग्रंथि से जुड़ी समस्याएं।
- लंबे समय तक शराब का सेवन, ख़राब जीवनशैली है।
कम टेस्टोस्टेरोन होने का टेस्ट कब करवाएँ-
डॉ. सुनील दुबे, बिहार के बेहतरीन सेक्सोलॉजिस्ट में से एक, बताते हैं कि टेस्टोस्टेरोन की कमी का पता मुख्य रूप से इसके लक्षणों से लगाया जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति को शक है कि उनका टेस्टोस्टेरोन लेवल कम हो गया है या असंतुलित हो गया है, तो उन्हें लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को लगातार कम यौन की इच्छा, इरेक्टाइल से जुड़ी समस्याएं, बिना किसी वजह के थकान या फर्टिलिटी से जुड़ी चिंताएं या मांसपेशियों का द्रव्यमान (मसल मास) कम होने जैसे लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो जांच के लिए सेक्सोलॉजिस्ट डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। जांच में आम तौर पर ये चीजें शामिल होती हैं:
- आपके लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री की समीक्षा।
- शारीरिक जांच।
- टेस्टोस्टेरोन के स्तर को मापने के लिए सुबह ब्लड टेस्ट; नतीजों की पुष्टि के लिए अक्सर इन्हें दोहराया जाता है।
- ज़रूरत पड़ने पर संबंधित हार्मोन की जाँच की जा सकती है।
अपने टेस्टोस्टेरोन के स्तर की जांच के लिए सुबह ब्लड टेस्ट करवाने के बारे में अपने सेक्सुअल हेल्थकेयर प्रोवाइडर से सलाह लें। चूंकि कम टेस्टोस्टेरोन का पता केवल लक्षणों के आधार पर नहीं लगाया जा सकता, इनमें से कई लक्षण टेस्टोस्टेरोन की कमी के अलावा अन्य कारणों से भी हो सकते हैं। यह पता लगाने के लिए कि क्या टेस्टोस्टेरोन की कमी है और क्या इलाज की ज़रूरत है, सही मेडिकल जांच और लैब टेस्ट की आवश्यकता होती है। अतः हेल्दी आदतें—जैसे रेगुलर एक्सरसाइज़, पूरी नींद, अच्छा खान-पान, स्ट्रेस मैनेजमेंट और हेल्दी वज़न बनाए रखना—टेस्टोस्टेरोन का नॉर्मल लेवल और ओवरऑल हेल्थ बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। अगर टेस्टोस्टेरोन का लेवल वाकई कम है, तो बिना डॉक्टर की सलाह के मिलने वाले "बूस्टर" पर भरोसा करने के बजाय, इसकी असली वजह का पता लगाने और सही इलाज तय करने के लिए मेडिकल जांच करवाना ज़रूरी है।
क्या टेस्टोस्टेरोन के स्तर को प्राकृतिक रूप से बेहतर बनाया जा सकता है?
जैसा कि अब तक हम समझ चुके है कि टेस्टोस्टेरोन एक ज़रूरी हार्मोन है जो यौन की इच्छा, स्पर्म बनने, मांसपेशियों की ताकत, हड्डियों की सेहत और ओवरऑल वेल-बीइंग में मदद करता है। अगर किसी व्यक्ति का टेस्टोस्टेरोन लेवल नॉर्मल रेंज में है, तो हेल्दी लाइफस्टाइल की आदतें इसे बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। अगर लेवल मेडिकल तौर पर कम है, तो सिर्फ़ सप्लीमेंट्स पर निर्भर रहने के बजाय, इसकी असल वजह का पता लगाना और उसका इलाज करना ज़रूरी होता है।
कुछ आदतें टेस्टोस्टेरोन के हेल्दी लेवल को बनाए रखने में मदद कर सकती हैं:
- शरीर का वज़न (लम्बाई के अनुपात में) सही बनाए रखें।
- नियमित रूप से व्यायाम करें, खासकर रेजिस्टेंस ट्रेनिंग मूलाधार है।
- प्रत्येक रात 7-9 घंटे की अच्छी नींद लें।
- प्रोटीन, हेल्दी फैट, जिंक और विटामिन D से भरपूर संतुलित आहार लें।
- लंबे समय तक रहने वाले तनाव को मैनेज करें।
- धूम्रपान से बचें और शराब का सेवन कम करें।
- डायबिटीज जैसी पुरानी बीमारियों को कंट्रोल में रखें।
चलिए इसे विस्तृत रूप में समझते है।
- शरीर का वज़न सही रखें: शरीर में ज़्यादा फ़ैट, खासकर पेट के आसपास, टेस्टोस्टेरोन के कम लेवल से जुड़ा होता है। संतुलित डाइट और नियमित शारीरिक गतिविधि से धीरे-धीरे वज़न कम करने पर हार्मोनल संतुलन बेहतर हो सकता है। यह तभी संभव है, जब व्यक्ति अपने वजन को नियंत्रण में रखे।
- नियमित रूप से व्यायाम करें: टेस्टोस्टेरोन का लेवल बनाए रखने के लिए शारीरिक गतिविधि सबसे असरदार प्राकृतिक तरीकों में से एक है। स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (हफ़्ते में 2-4 सेशन) से टेस्टोस्टेरोन का हेल्दी लेवल बनाए रखने में मदद मिल सकती है; कुछ लोगों के लिए हाई-इंटेंसिटी इंटरवल ट्रेनिंग (HIIT) भी फ़ायदेमंद हो सकती है। इसलिए, हर हफ़्ते 150 मिनट तक मध्यम-तीव्रता वाली एक्सरसाइज़ करने का लक्ष्य रखें और कम से कम दो दिन मांसपेशियों को मज़बूत करने वाली गतिविधियाँ शामिल करें। यह तभी संभव है, जब व्यक्ति नियमित रूप से अपने रूटीन में व्यायाम को शामिल करें।
- अच्छी नींद (खासकर रात) को प्राथमिकता दें: खराब नींद का सीधा संबंध टेस्टोस्टेरोन के कम स्तर से है। अतः यहाँ व्यक्ति को अपने अच्छी नींद को प्राथमिकता देना अनिवार्य है। हर रात 7-9 घंटे सोने की कोशिश करें। सोने का एक निश्चित समय बनाए रखें। सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें। अगर आपको स्लीप एपनिया के लक्षण दिखें, जैसे ज़ोर से खर्राटे लेना या दिन में बहुत ज़्यादा नींद आना, तो अपने डॉक्टर से अवश्य सलाह लें।
- संतुलित आहार लें: सिर्फ़ "टेस्टोस्टेरोन बढ़ाने वाले" एक ही तरह के खाने पर ध्यान देने के बजाय, ऐसा खाना चुनें जो आपकी पूरी सेहत के लिए फ़ायदेमंद हो। अतः व्यक्ति कुछ सामान्य चीज़ो को अपने दैनिक आहार में शामिल कर सकता है। यहाँ यह आहार शाकाहारी व मांसाहारी व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत हो सकता है। जैसे कि - लीन प्रोटीन (मछली, अंडे, चिकन, दालें), हेल्दी फैट्स (नट्स, बीज, ऑलिव ऑयल), साबुत अनाज (मुंग, मंसूर, दलिया), फल और सब्ज़ियाँ, डेयरी या कैल्शियम से भरपूर अन्य चीज़ें (अगर ज़रूरी हो) का नियमित सेवन। साथ-ही-साथ यह भी पक्का करें कि व्यक्ति को ज़रूरी पोषक तत्व जैसे ज़िंक, विटामिन D और मैग्नीशियम मिल रहे हैं, खासकर अगर इनकी कमी है।
- स्ट्रेस को मैनेज करें: हमें यह जरूर पता होना चाहिए कि व्यक्ति में लगातार स्ट्रेस से उसका कोर्टिसोल का लेवल बढ़ जाता है—यह एक ऐसा हार्मोन है जो टेस्टोस्टेरोन के सामान्य रेगुलेशन में रुकावट डाल सकता है। अतः तनाव को मैनेज करे जिससे यह स्थिति न उत्पन्न हो। कुछ फायदेमंद तरीकों में शामिल हैं, जैसे - रेगुलर एक्सरसाइज़, मेडिटेशन या माइंडफुलनेस, योग, गहरी साँस लेना, बाहर समय बिताना, और सोशल कनेक्शन बनाए रखना।
- अत्यधिक शराब के सेवन को कम करें और तंबाकू से बचें: ज़्यादा शराब पीने और स्मोकिंग से हार्मोन लेवल, फर्टिलिटी और सेक्सुअल हेल्थ पर बुरा असर पड़ सकता है। अतः अपने ख़राब जीवनशैली में बदलाव करे जो एक नियत समय में प्रतिबंधित हो जाता है।
- लंबे समय तक रहने वाली बीमारियों को मैनेज करें: कुछ बीमारियां, जैसे: टाइप 2 डायबिटीज़, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, और स्लीप एपनिया; ये सभी टेस्टोस्टेरोन के लेवल पर असर डाल सकती हैं। अतः इन बीमारियों का इलाज करने से हार्मोनल हेल्थ बेहतर हो सकती है। अतः अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे जो कुछ बीमारियों की वजह से यौन स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते है।
- दवाओं के बारे में अपने डॉक्टर से बात करें: कुछ दवाएं, जिनमें लंबे समय तक ली जाने वाली ओपिओइड दर्द निवारक दवाएं और कुछ स्टेरॉयड शामिल हैं, टेस्टोस्टेरोन के स्तर को काफी हद तक प्रभावित कर सकती हैं। अपने डॉक्टर से सलाह लिए बिना कभी भी निर्धारित दवाएं लेना बंद न करें।
- सप्लीमेंट्स टेस्टोस्टेरोन बूस्टर से बचे: "टेस्टोस्टेरोन बूस्टर" के तौर पर बेचे जाने वाले कई प्रोडक्ट्स के समर्थन में बहुत कम या कोई भरोसेमंद वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं। कुछ में ऐसे इंग्रीडिएंट्स हो सकते हैं जो असरदार नहीं हैं या जिनसे नुकसान हो सकता है। किसी भी सप्लीमेंट का इस्तेमाल करने से पहले अनुभवी व भरोसेमंद सेक्सुअल हेल्थकेयर प्रोफेशनल से सलाह लेना सबसे अच्छा है।
ज़रूरी बात: टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी हर किसी के लिए सही नहीं है। इसका इस्तेमाल तभी किया जाता है जब यह मेडिकल तौर पर अति आवश्यक या ज़रूरी हो और इसे किसी क्वालिफाइड हेल्थकेयर प्रोवाइडर की देखरेख में, सही जांच-पड़ताल के बाद ही दिया जाए।
मुख्य बात: टेस्टोस्टेरोन यौन की इच्छा, स्पर्म बनने और सामान्य इरेक्टाइल फ़ंक्शन (लिं**ग में तनाव) में अहम भूमिका निभाता है, लेकिन यौन क्रिया के परफॉर्मेंस तय करने वाला यह अकेला कारण नहीं है। अगर किसी को लगातार यौन की इच्छा में कमी, इरेक्टाइल डिसफंक्शन या कम टेस्टोस्टेरोन के लक्षण महसूस हों, तो उन्हें डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। सेक्सुअल हेल्थकेयर प्रोफेशनल ब्लड टेस्ट और व्यक्ति की ओवरऑल हेल्थ के आधार पर यह तय कर सकते हैं कि क्या टेस्टोस्टेरोन इसमें कोई भूमिका निभा रहा है, और सही इलाज का सुझाव दे सकते हैं।
टेस्टोस्टेरोन बढ़ाने वाली टॉप 5 आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ
डॉ दुबे, पटना के टॉप आयुर्वेदिक सेक्सोलॉजिस्ट डॉक्टर जो दुबे क्लिनिक में प्रैक्टिस करते है और सभी तरह के गुप्त व यौन समस्याओं को व्यापक रूप से इलाज करते है। वे बताते है कि कोई भी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी या रस-रसायन सीधे तौर और लगातार टेस्टोस्टेरोन के स्तर को नहीं बढ़ाते है। हां यह अवश्य है कि यह व्यक्ति के प्रकृति, संरचना, व वर्त्तमान स्थिति के अनुरूप तैयार की गई व्यक्तिगत उपचार जिसमे व्यक्ति के स्वास्थ्य का समग्र दृष्टिकोण शामिल है, काफी हद तक टेस्टोस्टेरोन के स्तर में वृद्धि करता है। चुकी आयुर्वेद हमेशा ही समग्र दृषिकोण पर ध्यान केंद्रित करता है, अतः यह व्यक्ति को प्रकृति के अनुरूप ढालने में मदद करता है। आयुर्वेद में पारंपरिक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली कुछ जड़ी-बूटियों का पुरुषों की प्रजनन क्षमता, तनाव, ऊर्जा या फर्टिलिटी पर संभावित असर जानने के लिए अध्ययन किया गया है। हालाँकि, इसके सबूत मिले-जुले रहे हैं फिर भी अच्छी क्वालिटी व गुणवत्तपूर्ण रिसर्च की की गई जड़ी-बूटी का अपना अलग ही महत्व है। भारत में, टॉप 5 आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ, जिनका व्यक्ति के हॉर्मोन के संतुलन व टेस्टोस्टेरोन के वृद्धि में सर्वाधिक इस्तेमाल किया जाता है, वे निम्नलिखित है:
- अश्वगंधा (विथानिया सोमनिफेरा): यह जड़ी-बूटी तनाव कम करने और प्रजनन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की अपनी क्षमता के लिए जानी जाती है। अच्छी क्वालिटी वाली अश्वगंधा कई ऐसे संभावित फ़ायदे देती है जो व्यक्ति की सेहत को बेहतर बनाते हैं। यह उन पुरुषों में स्पर्म की क्वालिटी सुधारने में मदद करती है जो इनफ़र्टिलिटी (बांझपन) से जूझ रहे हैं। यह कुछ खास समूहों में टेस्टोस्टेरोन का हेल्दी लेवल बनाए रखने में मदद कर सकती है—खासकर उन पुरुषों में जिन्हें तनाव की वजह से इनफ़र्टिलिटी की समस्या है या जो रेजिस्टेंस ट्रेनिंग करते हैं। इसके नियमित इस्तेमाल से एनर्जी, ताकत और सेक्सुअल हेल्थ बेहतर हो सकती है। पारंपरिक आयुर्वेद में, शरीर को नई ऊर्जा देने वाले टॉनिक के गुणों के कारण इसे शरीर को फिर से जीवंत करने वाली जड़ी-बूटी का दर्जा मिला है।
- सफ़ेद मूसली (क्लोरोफाइटम बोरिविलियनम): इस जड़ी-बूटी की सबसे खास बात यह है कि यह एनर्जी और सेक्सुअल हेल्थ को बेहतर बनाती है। यह *वाजीकरण* (कामोत्तेजक) थेरेपी के तौर पर कई फ़ायदे देती है और पारंपरिक रूप से स्टैमिना और कामेच्छा (लिबिडो) को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। स्टडीज़ से पता चलता है कि यह रिप्रोडक्टिव हार्मोन पर सकारात्मक असर डाल सकती है, हालांकि इसके लिए अच्छी क्वालिटी और असली फ़ॉर्मूलेशन की ज़रूरत होती है। इसे अक्सर पुरुषों की सेहत के लिए बनाए गए आयुर्वेदिक फ़ॉर्मूलेशन में शामिल किया जाता है।
- गोक्षुरा (ट्रिबुलस टेरेस्ट्रिस): गोक्षुर की एक खास बात यह है कि यह पुरुषों की ताकत और यूरिनरी हेल्थ को बेहतर बनाता है। पारंपरिक रूप से, इसका इस्तेमाल कामेच्छा (लिबिडो) बढ़ाने वाली जड़ी-बूटी के तौर पर किया जाता रहा है। कुछ स्टडीज़ से पता चलता है कि यह कुछ लोगों में यौन की इच्छा बढ़ाने में मदद करता है। हालांकि, आयुर्वेदिक फ़ॉर्मूलेशन के मामले में, इसकी क्वालिटी और असलियत पर खास ध्यान देना ज़रूरी है। जब खास फ़ॉर्मूलेशन को आयुर्वेदिक इलाज और समग्र दृष्टिकोण (holistic approach) के साथ मिलाया जाता है, तो देखा गया है कि ये स्वस्थ पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का लेवल बढ़ाने में मदद करते हैं।
- शिलाजीत: शिलाजीत का मुख्य गुण ऊर्जा और जीवन-शक्ति से जुड़ा है। क्लिनिकल स्टडीज़ से पता चलता है कि शुद्ध शिलाजीत कुछ अधेड़ उम्र के पुरुषों में कुल और फ्री टेस्टोस्टेरोन के स्तर को बढ़ा सकता है। यह ऊर्जा के स्तर और शारीरिक क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। आयुर्वेद में अच्छी क्वालिटी और शुद्ध शिलाजीत को प्राथमिकता दी जाती है।
- कौंच बीज (म्यूकुना प्रुरिएंस): कौंच बीज (म्यूकुना प्रुरिएन्स) पुरुषों की फर्टिलिटी और रिप्रोडक्टिव हेल्थ को बेहतर बनाने के लिए जाना जाता है। इसके कायाकल्प करने वाले गुण उन पुरुषों में स्पर्म काउंट और मोटिलिटी को बेहतर बनाने में मदद करते हैं जो इनफर्टिलिटी से जूझ रहे हैं। इसमें L-DOPA होता है, जो डोपामाइन पाथवे पर असर डालता है। किसी योग्य आयुर्वेदिक सेक्सोलॉजिस्ट की देखरेख में इस्तेमाल करने पर इसके सबसे अच्छे फायदे मिलते हैं।
जड़ी-बूटियों के साथ-साथ लाइफस्टाइल भी है जरूरी:
आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करते समय, टेस्टोस्टेरोन का लेवल हेल्दी बनाए रखने के लिए सबसे जरुरी बात है हैल्थी लाइफ़स्टाइल की आदतों को शामिल करना।
- नियमित रूप से व्यायाम करें, खासकर रेजिस्टेंस ट्रेनिंग।
- हर रात 7-9 घंटे की नींद लें।
- शरीर का वज़न सही बनाए रखें।
- प्रोटीन, हेल्दी फैट, फल, सब्ज़ियाँ और साबुत अनाज वाला संतुलित आहार लें।
- लंबे समय से चले आ रहे तनाव को मैनेज करें।
- बहुत ज़्यादा शराब पीने से बचें और तंबाकू का इस्तेमाल न करें।
डॉ. दुबे बताते हैं कि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों में, पुरुषों की प्रजनन क्षमता से जुड़े सबसे मज़बूत सबूत अश्वगंधा के पक्ष में हैं, जबकि कुछ सबूत यह भी बताते हैं कि शिलाजीत कुछ पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ा सकता है। पारंपरिक आयुर्वेद में सफ़ेद मूसली, गोक्षुर और कौंच बीज का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है; हालाँकि, टेस्टोस्टेरोन बढ़ाने की इनकी क्षमता पूरी तरह से उच्च-गुणवत्ता वाले, सटीक आयुर्वेदिक फ़ॉर्मूलेशन और इन खास 'रस-रसायन' (कायाकल्प करने वाले) तत्वों के सही अनुपात पर निर्भर करती है।
क्या आयुर्वेदिक इलाज से टेस्टोस्टेरोन का कम स्तर ठीक हो सकता है? वैज्ञानिक नज़रिए से जानें।
यह सत्य है कि आयुर्वेद पुरुषों में कम टेस्टोस्टेरोन से जुड़े लक्षणों में मदद करता है, खासकर तब जब इसकी वजह जीवनशैली से जुड़ी बातें या कुछ खास स्वास्थ्य स्थितियां हों। अगर वैज्ञानिक रूप से, आयुर्वेदिक इलाज को देखा जाय तो यह केवल एकीकृत उपचार योजना में प्रामाणिक और ठोस परिणाम देता है। इसका मूल कारण यह है कि आयुर्वेदिक दृष्टिकोण आधुनिक चिकित्सा उपचार के साथ मिलकर एक समस्त उपचार योजना विकसित करता है। यह आधुनिक आयुर्वेदिक उपचार योजना सभी मामलों में चिकित्सकीय रूप से प्रामाणिक व व्यक्तिगत होता है जिसका प्रभावपूर्ण परिणाम व्यक्ति को उसके समस्या के मूल कारण व शारीरिक संरचना पर आधारित होता है।
पुरुषों में कम टेस्टोस्टेरोन (पुरुष हाइपोगोनैडिज्म) का मुख्य कारण:
- उम्र बढ़ना
- मोटापा
- टाइप 2 डायबिटीज
- लंबे समय तक तनाव
- खराब नींद या स्लीप एपनिया
- कुछ दवाएं
- अंडकोष से जुड़ी समस्याएं
- पिट्यूटरी ग्रंथि से जुड़ी समस्याएं
चूंकि इस समस्या के कारण अलग-अलग होते हैं, इसलिए इसके सही इलाज के लिए कई तरह की थेरेपी को मिलाकर इस्तेमाल करना ज़रूरी है।
आयुर्वेदिक इलाज में अक्सर ये चीजें शामिल होती हैं:
- खान-पान से जुड़ी सलाह
- शारीरिक गतिविधि
- नींद में सुधार
- तनाव कम करना
- वजन को नियंत्रित करना
- प्रामाणिक जड़ी-बूटियों वाली दवाएं
- कुछ मामलों में, पंचकर्म थेरेपी
इनमें से कई तरीके जीवनशैली में उन बदलावों जैसे हैं जो हार्मोनल सेहत को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।
- लंबे समय तक रहने वाले तनाव को कम करना: स्ट्रेस से कोर्टिसोल का लेवल बढ़ जाता है, जिससे शरीर का हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है। योग, मेडिटेशन और स्ट्रेस मैनेजमेंट जैसी चीज़ें ओवरऑल हेल्थ और सेक्सुअल वेल-बीइंग को बेहतर बनाने में मदद करती हैं। कुछ साक्ष्य व रिसर्च से यह पता चलता है कि अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियाँ स्ट्रेस कम करने और कुछ ग्रुप्स में पुरुषों की फर्टिलिटी से जुड़ी चीज़ों को बेहतर बनाने में मददगार साबित होती हैं। आयुर्वेदिक उपचार योजना में अश्वगंधा के रस-रसायन लंबे समय तक रहने वाले तनाव को कम करने में काफी मददगार साबित होती है।
- स्वस्थ वजन बनाए रखना: शरीर में ज़्यादा फ़ैट का संबंध टेस्टोस्टेरोन के कम लेवल से होता है। आयुर्वेदिक सलाह व व्यक्तिगत उपचार जो संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि को भी बढ़ावा देती है, वज़न को कंट्रोल करने में मदद करती है। इससे कुछ पुरुषों में हार्मोन का लेवल बेहतर होता है जिनका मूल कारण उनके शारीरिक कारक खासकर मोटापा से जुड़ा है।
- नींद में सुधार: खराब नींद का सीधा संबंध टेस्टोस्टेरोन के कम स्तर से है। अच्छी नींद की आदतों को बढ़ावा देने वाले आयुर्वेदिक उपाय, सामान्य हार्मोन उत्पादन में अप्रत्यक्ष रूप से मदद कर सकते हैं।
- प्रजनन क्षमता में मदद: कुछ आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का स्पर्म काउंट, स्पर्म की गतिशीलता और सीमेन की क्वालिटी पर संभावित असर को लेकर रिसर्च की गई है। इस रिसर्च से यह स्पष्ट हो गया है कि फर्टिलिटी से जुड़े पैरामीटर्स में सुधार का आयुर्वेदिक उपचार का महत्वपूर्ण योगदान है साथ-ही इसके उपयोग से टेस्टोस्टेरोन का लेवल बढ़ गया है।
वैज्ञानिक रिसर्च क्या कहती है?
आयुर्वेदिक सेक्सोलॉजी के जाने-माने एक्सपर्ट डॉ. सुनील दुबे, बिहार के पटना में दुबे क्लिनिक में प्रैक्टिस और रिसर्च करते हैं। भारत में इस क्षेत्र के एक सफल और भरोसेमंद रिसर्चर के तौर पर, उनका कहना है कि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों पर की गई रिसर्च से काफी उम्मीदें हैं और कुछ क्षेत्रों में इसके बहुत अच्छे नतीजे मिले हैं, हालांकि कुछ जड़ी-बूटियों के बारे में अभी भी सीमित सबूत ही मौजूद हैं। आयुर्वेदिक इलाज विकसित करते समय इस बात का भी खास ध्यान रखना ज़रूरी है कि आयुर्वेदिक केमिकल फ़ॉर्मूलेशन से हाई-क्वालिटी और शुद्ध नतीजे मिलें। कुछ प्रामाणिक जड़ी-बूटियों में शामिल है।
- अश्वगंधा: कई स्टडीज़ से पता चलता है कि यह कुछ पुरुषों में स्पर्म की क्वालिटी को बेहतर बना सकता है, स्ट्रेस को कम कर सकता है और टेस्टोस्टेरोन का लेवल बढ़ा सकता है—खासकर उन पुरुषों में जो इनफर्टिलिटी (बांझपन) से जूझ रहे हैं या रेजिस्टेंस ट्रेनिंग (वेट ट्रेनिंग) कर रहे हैं। हालांकि, बेहतर क्वालिटी के लिए सही फॉर्मूले व शुद्धिकरण की आवश्यकता होती है।
- शिलाजीत: कुछ क्लिनिकल स्टडीज़ में पाया गया है कि शुद्ध शिलाजीत का इस्तेमाल करने वाले अधेड़ उम्र के पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का लेवल बढ़ा है, लेकिन इसका इस्तेमाल हमेशा एक्सपर्ट के सलाह व निरीक्षण में करना ज्यादा बेहतर होता है।
- सफेद मूसली, गोक्षुर और कौंच बीज: इन सभी जड़ी-बूटियों का पारंपरिक रूप से इस्तेमाल एक लंबे समय से होता आ रहा है, लेकिन टेस्टोस्टेरोन बढ़ाने के लिए इनके बारे में मौजूदा वैज्ञानिक सबूत भिन्न-भिन्न है। अतः आयुर्वेदिक सूत्रीकरण में इनका उपयोग तभी सुरक्षित व प्रभावपूर्ण हो पाता है जब प्रामाणिक आयुर्वेदिक एक्सपर्ट इसे वैज्ञानिक रूप से विकसित करता हो।
कुल मिलाकर, उपलब्ध सबूत इस दावे का समर्थन नहीं करते हैं कि आयुर्वेदिक इलाज से उन पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का लेवल लगातार सामान्य हो सकता है, जिनमें मेडिकल तौर पर हाइपोगोनैडिज्म (टेस्टोस्टेरोन की कमी) की पुष्टि हुई है। इसका मुख्य कारण यह है कि टेस्टोस्टेरोन की कमी कई वजहों से हो सकती है, जैसे कि अंडकोष को नुकसान, जेनेटिक स्थितियां, पिट्यूटरी से जुड़ी समस्याएं, कैंसर के कुछ इलाज और कुछ पुरानी बीमारियां। इसलिए, जीवनशैली में बदलाव और हर्बल थेरेपी को मिलाकर एकीकृत आयुर्वेदिक इलाज का तरीका अपनाने से हार्मोन की कमी को पूरी तरह ठीक करने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी स्थितियों में, मेडिकल जांच और कुछ मामलों में हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी या दूसरे खास इलाज की भी ज़रूरत पड़ सकती है।
आयुर्वेद से सेहत को बेहतर बनाने, तनाव कम करने, वज़न को कंट्रोल करने और नींद व रिप्रोडक्टिव हेल्थ को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है—इन सभी चीज़ों का टेस्टोस्टेरोन के लेवल पर परोक्ष रूप से असर पड़ सकता है। हालांकि शुरुआती रिसर्च में कुछ आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के अच्छे नतीजे दिखे हैं, लेकिन मौजूदा सबूतों से यह पता चलता कि एकीकृत आयुर्वेदिक इलाज से हर मामले में क्लिनिकली डायग्नोस किए गए कम टेस्टोस्टेरोन की समस्या को भरोसेमंद तरीके से ठीक किया जा सकता है।
अगर आपको कामेक्षा में कमी (लिबिडो), इरेक्टाइल डिस्फंक्शन, थकान या बांझपन जैसे लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो सबसे अच्छा तरीका है कि आप मेडिकल जांच करवाएं—जिसमें सुबह टेस्टोस्टेरोन टेस्ट भी शामिल हो—ताकि असल वजह का पता चल सके और सही इलाज तय किया जा सके। सही मेडिकल देखभाल के साथ-साथ जीवनशैली में ऐसे बदलाव करना, जो वैज्ञानिक रूप से सही साबित हुए हों, अक्सर सबसे अच्छे नतीजे देता है। आयुर्वेद का एकीकृत उपचार योजना जो आधुनिक, पारंपरिक, व समस्त दृष्टिकोण पर आधारित हो, किसी भी यौन समस्या को जड़ से निपटने में मददगार साबित होता है।